EK THI ASMA
एक पाकिस्तानी धरम गुरु ने एक महफ़िल मैं बताया था की हाफिज मुहम्मद शरीफ नामी एक बुज़ुर्ग,रियाज़ से पाकिस्तान आये थे ,हमारे एक दोस्त शौकत मलिक साहिब के घर पर मुलाक़ात होई-उन्हों ने बात चीत मैं कहा की हम सामाजिक कामों में बहुत पीछे हैं, इस सिलसिलए में, असमा जहांगीर की एक वाक़या सुनाया -
मेरे एक मुलाक़ाती जिन्हें मौत की सज़ा हो चुकी थी उनसे जेल में मुलाकात के लिए गया तो वह बहुत परेशान थे और कहने लगे हाफिज साहब यक़ीन मानिये मैं ने किसी को नहीं मारा और मुझे बग़ैर किसी गुनाह की सज़ा दी जा रही -
मैंने उन्हें तसल्ली दी ,दुआ और तसल्ली के अलावा मैं कर भी किया सकता था - मैं वापस आ गया -
कुछ दिनों बाद मौत की सज़ा पाने वाले कैदी से एक बाज़ार मुलाक़ात हो गयी ,में बड़ा हैरान हुआ कि तुम्हें तो मौत की सज़ा हो चुकी थी और आप तो ज़िंदह हैं और आज़ाद भी -
वह कहने लगा कि आपके जाने के बाद मुझे पता चला कि अस्मा जहांगीर नाम की एक महिला वकील मुझ जैसे लोगों के मुक़दमे मुक्त लड़ती है - चुनांचे मैं ने एक खत उन को लिख -बताया की मुझे फंसाया गया है - जहांगीर ने मेरा मुक़दमा लड़ा और मुझे रिहाई दिला दी -
हाफिज साहब फरमाने लगे कि अब आप ही बताइए हम सब बार बार अस्मा जहांगीर को मुर्तद और काफ़िर क़रार देते रहें लेकिन उस क़ैदी के लिए सबसे बड़ी मुसलमान ही वह है .










